- नंदनवन जंगल सफारी , मोहरेंगा सफारी सहित प्रदेश के वनो को सींचने वाले रेंजर की कहानी, जिन्होंने पेड़ लगाए भी और तस्करों को भी जेल पहुंचाया
दिनेश यदु @ Raipur . “पेड़ लगाना सिर्फ एक काम नहीं, एक जुनून है… जैसे कोई अपने बच्चे को बड़ा होते देखता है, वैसे ही मैंने हर पौधे को बड़ा होते देखा है।” यह कहना है रायपुर वनमंडल के रेंजर दीपक तिवारी का, जिन्होंने इस विश्व पर्यावरण दिवस पर चलाए जा रहे हरियाली अभियान को केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन में बदलने की ठानी है।
दीपक तिवारी की कहानी सिर्फ पौधे लगाने की नहीं है, बल्कि जंगलों से जुड़कर उन्हें जीवित रखने की भी है। उन्होंने मोहरेंगा नेचर सफारी को अपनी देखरेख में खड़ा किया है – जहां पहले वीरान जमीन थी, वहां अब पक्षियों की चहचहाहट और हिरणों की छलांगें सुनाई देती हैं। “हर सुबह जब मोहरेंगा की हरियाली देखता हूं, तो लगता है जैसे कोई सपना हकीकत बन गया हो,” वे मुस्कुराकर कहते हैं।

पौधों से प्यार और तस्करों से टकराव
दीपक तिवारी का एक दूसरा चेहरा भी है – जो जंगलों के दुश्मनों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई वन्यप्राणी तस्करों को धर दबोचा और सीधे सलाखों के पीछे पहुंचाया। “हमें जंगल की रक्षा करनी है – चाहे वो पेड़ हों या जानवर। दोनों ही हमारे पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं,” वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए सिर्फ प्रचार नहीं, कड़ा एक्शन भी जरूरी है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने क्षेत्र में संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई, स्थानीय ग्रामीणों को साथ जोड़ा और तस्करी पर नकेल कसने के लिए सूचना तंत्र मजबूत किया।

हरियाली अभियान: हर हाथ एक पौधा
इस बार पर्यावरण दिवस पर दीपक तिवारी ने खुद मोर्चा संभाला है। उन्होंने बताया कि “केवल एक दिन पौधे लगाना काफी नहीं, हमें इसे जीवनशैली बनाना होगा। हम इस बार लगभग 1 लाख पौधे विश्व पर्यावरण दिवस पर लगा रहे हैं और पूरे मानसून में 2 करोड़ पौधों का लक्ष्य है। हर स्कूल, हर इंडस्ट्री और हर मोहल्ला इसमें भाग ले रहा है।” दीपक बताते हैं कि वन मंत्री केदार कश्यप और पीसीसीएफ श्रीनिवास राव ने स्पष्ट संदेश दिया है – यह अभियान सिर्फ गिनती नहीं, बल्कि गुणवत्ता का प्रतीक बने। इसलिए स्थानीय प्रजातियों के पौधों का चयन किया गया है – जैसे सागौन, कुसुम, करंज और आम – जो ना केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि पक्षियों और जंगली जानवरों के लिए भी उपयुक्त आवास देते हैं।

प्रेरणादायक बन रही है उनकी टीम
दीपक तिवारी की टीम आज युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है। उन्होंने ‘ग्रीन वॉरियर’ प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसमें स्कूल के बच्चों को पौधों की जिम्मेदारी सौंपी जाती है – वे खुद उसे लगाते हैं, पानी देते हैं और उसकी बढ़त पर रिपोर्ट बनाते हैं। सामाजिक संस्थाएं, NSS ग्रुप, महिला मंडल और कई इंडस्ट्री हाउस भी उनकी पहल से जुड़ चुके हैं। वे कहते हैं, “अगर समाज साथ हो, तो हरियाली सिर्फ सपना नहीं, हकीकत बन सकती है।”

हरियाली की ये कहानी, हर दिल से जुड़नी चाहिए
रेंजर दीपक तिवारी की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब इरादा पक्का हो, तो बंजर धरती भी हरी हो सकती है। उन्होंने न सिर्फ पेड़ लगाए, बल्कि जंगलों की आत्मा को बचाया। और आज जब पूरा छत्तीसगढ़ ‘हरियाली का संकल्प’ ले रहा है, तो उसके पीछे ऐसे ही समर्पित रेंजरों की मेहनत है। “पेड़ लगाइए, पर्यावरण बचाइए… और सबसे जरूरी, प्रकृति से रिश्ता फिर से बनाइए,” – दीपक तिवारी का ये संदेश सिर्फ शब्द नहीं, एक संकल्प है जो आज हर नागरिक के मन में गूंज रहा है।
