- गोकुल सोनी: सरकारी बाबू की उम्मीद छोड़ कैमरे से छत्तीसगढ़ की अनोखी कहानी लिखने वाला फोटोग्राफर
- छोटे गांव से बड़े शहर तक: संघर्ष और सपनों का सफर
दिनेश यदु @ Raipur : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में फोटोग्राफी की बात हो और गोकुल सोनी का नाम ना आए, ऐसा संभव नहीं। उन्होंने एक छोटे गांव से निकलकर न केवल एक पेशेवर पहचान बनाई, बल्कि कैमरे को सामाजिक बदलाव का जरिया भी बना दिया। गोकुल ने गांव की प्राथमिक पढ़ाई के बाद रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से पढ़ाई की। कॉलेज में हिंदी-अंग्रेजी टाइपिंग और शॉर्टहैंड सीखकर वे सरकारी बाबू बनने के करीब पहुंचे, पर उनका दिल फोटोग्राफी की तरफ था। उन्होंने नवभारत अखबार में लिपिक की नौकरी के साथ कैमरा उठाना शुरू किया और यहीं से उनका फोटोग्राफी का सफर शुरू हुआ।

तस्वीरों से इतिहास रचने वाले ‘गो सो
गोकुल सोनी, जिन्हें ‘गो सो’ नाम मिला, छत्तीसगढ़ के पहले प्रेस फोटोग्राफर बने जब उनकी तस्वीर नवभारत के पहले पन्ने पर छपी। परिवार में दो नाम रखने की परंपरा के चलते उनका राशि नाम कैलाश था। नवभारत के तत्कालीन संपादकीय प्रमुख उमाशंकर व्यास ने हमेशा कुछ नया करने की पहल की। उन्होंने गोकुल सोनी को लेकर एक अनोखा स्तंभ शुरू करवाया – ‘शब्द नहीं चित्र’, जिसमें कोई कैप्शन नहीं होता था, सिर्फ एक चित्र – जो पूरी कहानी खुद कह जाता। उस चीनी कहावत – “एक चित्र, हजार शब्दों के बराबर होता है” – को गोकुल जी की तस्वीरों ने जीवंत कर दिखाया।
डार्करूम से डिजिटल तक: हर तकनीक में दक्षता
गोकुल ने कैमरा चलाना सिर्फ सीखना ही नहीं, बल्कि डार्करूम में खुद तस्वीरें बनाना, कैमिकल्स का इस्तेमाल करना भी सीखा। सफेद-श्याम तस्वीरों से लेकर कलर फोटोग्राफी तक उन्होंने हर तकनीक को अपने अनुभव से आत्मसात किया। आज जब डिजिटल और मिररलेस कैमरों का दौर है, तब भी गोकुल ने अपने आप को अपडेट रखा है। कभी साइकिल से दूर-दराज के इलाकों में घंटों जाकर तस्वीरें खींचना, तो कभी कैमरे की बैटरी खत्म होने पर टॉर्च की रोशनी में फोटो एडिट करना, उनके समर्पण की कहानी कहता है।

हादसों और आयोजनों का साक्षी
छत्तीसगढ़ में हुई कई बड़ी घटनाओं, दुर्घटनाओं, और ऐतिहासिक कार्यक्रमों की तस्वीरें गोकुल के कैमरे से ही सामने आती हैं। इंदिरा गांधी की रैली हो, नरेंद्र मोदी के स्वागत समारोह, स्कूल-कॉलेज की फोटोग्राफी कार्यशाला हो या राजनीतिक धरना, गोकुल हर महत्वपूर्ण जगह पर मौजूद रहे। उनकी तस्वीरें सिर्फ चित्र नहीं, बल्कि इतिहास की एक जीवंत दस्तावेज़ हैं, जो भावनाओं और घटनाओं को अपने लेंस में कैद कर देती हैं।
संघर्ष और सम्मान: कहानी उनके हौंसले की
फोटोग्राफी की दुनिया में गोकुल ने कई बार पुलिस की लाठी भी खाई है। भीड़ को नियंत्रित करते हुए चोटें आईं, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके साथ ही, उनके काम को कई बार पत्रकार संघ, शिक्षण संस्थान और सामाजिक संगठनों ने सराहा और सम्मानित किया। उनका संघर्ष और सफलता दोनों ही उनकी कहानी को और भी प्रेरणादायक बनाते हैं।

फोटोग्राफी शिक्षक और कहानीकार
गोकुल आज सिर्फ तस्वीरें खींचने वाले फोटोग्राफर नहीं हैं, बल्कि वह युवाओं को फोटोग्राफी की बारीकियां सिखाने वाले शिक्षक भी हैं। वे स्कूलों और कॉलेजों में जाकर छात्रों को कैमरा चलाने की तकनीक के साथ-साथ यह भी समझाते हैं कि हर तस्वीर एक कहानी कहती है। उनका मानना है, “एक तस्वीर सौ शब्दों के बराबर होती है।” इसलिए वे युवा फोटोग्राफरों को सही फ्रेमिंग, लाइटिंग और भावनाओं को पकड़ने की कला सिखाते हैं।

मानवीय संवेदनाओं को कैमरे में कैद करना
गोकुल का कहना है कि फोटोग्राफी सिर्फ कैमरे की तकनीक नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय भावनाओं को दिखाना भी बहुत जरूरी है। दुर्घटनाओं की तस्वीरों में दर्द, रैलियों की तस्वीरों में जोश, और ग्रामीण त्योहारों की तस्वीरों में खुशियों को वे बड़ी कुशलता से कैद करते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर ‘छत्तीसगढ़ की आत्मा’ नाम से एक ब्लॉग भी शुरू किया है, जिसमें अपनी तस्वीरों के साथ छोटे-छोटे संस्मरण साझा करते हैं।

