सच्चाई पर पर्दा, ईमानदार अफसर को मिली सजा: आरोपी आज भी फरार, लेकिन टीआई का हुआ डिमोशन

दिनेश यदु @ Raipur: मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के नाम पर 82 लाख रुपए की धोखाधड़ी के मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करने वाले ईमानदार टीआई कलीम खान को विभागीय जांच के बाद एसआई के पद पर डिमोट कर दिया गया है, जबकि असली आरोपी पैरोल पर बाहर आने के बाद से ही फरार है। पूरे मामले में एक नई बहस छिड़ गई है कि आखिर जिस केस में ईमानदारी से कार्रवाई हुई, उसी मामले में कार्रवाई करने वाले अफसर को ही क्यों सजा दी गई?

यह मामला 2020 का है, जब कोनी थाना क्षेत्र के रहने वाले तरुण साहू ने अपनी बेटी के मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए दिल्ली में संपर्क किया था। इस दौरान दीपक चटर्जी, डॉ. जियाउल हक रहमानी और प्रभुदीप सिंह नाम के लोगों ने झूठे वादे कर तरुण साहू, दीपक शर्मा और अन्य से कुल 82 लाख रुपये ठग लिए। जब ठगी का खुलासा हुआ, तब तत्कालीन एसपी प्रशांत अग्रवाल ने टीआई कलीम खान को दिल्ली भेजा, जिन्होंने आरोपियों को गिरफ्तार कर मोबाइल और नकदी भी जब्त की।

लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी के सात महीने बाद एक नया मोड़ आया, जब मुख्य आरोपी जियाउल हक की पत्नी ने टीआई कलीम खान पर चार लाख रुपए मांगने और अभद्रता करने का आरोप लगाया। शिकायत को गंभीर मानते हुए तत्कालीन एसपी दीपक झा ने जांच शुरू कराई। सूत्रों के मुताबिक, जांच में कलीम खान पर लगे आरोप साबित नहीं हुए। महिला द्वारा बताए गए समय पर कलीम का लोकेशन मुंबई में पाया गया और दोनों पति-पत्नी की आपसी बातचीत से भी पैसे की मांग की पुष्टि नहीं हुई।

इसके बावजूद विभागीय जांच के आधार पर आईजी डॉ. संजीव शुक्ला ने कलीम खान को दोषी मानते हुए उनका डिमोशन कर एक साल के लिए एसआई बना दिया। जबकि अब तक उस मामले के असली आरोपी को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई है, जो पैरोल के बाद फरार है।

खास बात यह है कि इसी मामले में 2021 में फरियादी तरुण साहू ने भी एक शिकायत की थी, जिसमें उन्होंने वीडियो और चैटिंग के साक्ष्य के साथ यह आशंका जताई थी कि आरोपी और उसकी पत्नी मिलकर उन्हें और टीआई को फंसा सकते हैं। लेकिन उस शिकायत पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की गई।

प्रस्तुतकर्ता अधिकारी सीएसपी उदयन बेहार की रिपोर्ट में भी कहा गया कि महिला के आरोप निराधार हैं और कोई असामान्य बातचीत नहीं हुई। बावजूद इसके, मीडिया का एक वर्ग बिना तथ्यों की जांच किए टीआई को कठघरे में खड़ा करने लगा।

अब सवाल यह उठता है कि जब ईमानदार अफसर को ही सजा मिल रही है और असली आरोपी खुलेआम घूम रहा है, तो इससे सिस्टम में काम कर रहे अन्य अफसरों का मनोबल कैसे ऊंचा रहेगा? यह मामला न केवल पुलिस महकमे के भीतर की राजनीति को उजागर करता है, बल्कि ईमानदारी से काम करने वालों के लिए एक चेतावनी भी है।

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