- आरोपित सदस्य पर अनुशासनहीनता के केस
- जांच समिति का गठन और उसके बाद की अनियमितताएँ
- पुस्तकों का दान नहीं हुआ था, एक गहरी साजिश का हिस्सा था
रायपुर @ राज्य के एक शैक्षिक संस्थान में पुस्तकों के दान को लेकर विवाद अब गंभीर रूप ले चुका है। तत्कालीन प्राचार्य डॉ. पी.सी. चौबे द्वारा गठित जाँच समिति पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, जिसमें समिति के एक सदस्य पर गोपनीय रिपोर्ट चुराने और पुस्तकों के दान को लेकर झूठे आरोप लगाने का आरोप है। यह मामला केवल पुस्तकों के दान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जाँच प्रक्रिया में गड़बड़ी की ओर भी इशारा करता है।

जांच समिति का गठन और उसके बाद की अनियमितताएँ
शासकीय नागार्जुन स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. सरोज शर्मा ने बताया कि डॉ. पी.सी. चौबे ने एक शिकायत के आधार पर बिना भौतिक सत्यापन के जांच समिति का गठन किया था। समिति का उद्देश्य महाविद्यालय में दान की गई 33 पुस्तकों की सच्चाई का पता लगाना था, लेकिन जब इसकी जांच की गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। समिति के ही एक सदस्य गोपनीय रिपोर्ट चोरी करने में संलिप्त पाया गया, जिससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे।
डॉ. दीपक सिन्हा, जो शिकायतकर्ता के रिश्तेदार भी हैं, उनके विरुद्ध उच्च शिक्षा विभाग में कई शिकायतें पहले से लंबित हैं। बताया जा रहा है कि डॉ. सिन्हा द्वारा एलएलबी के लिए जो अनुमति ली गई थी, उसे विभाग द्वारा पहले ही निरस्त कर दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने छत्तीसगढ़ महाविद्यालय को बिना किसी सूचना दिए चोरी-छिपे एलएलबी की पढ़ाई जारी रखी।
इस मामले से संबंधित कई शिकायतें पूर्व में भी विभाग के पास दर्ज की गई थीं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि न तो इन शिकायतों की गंभीरता से जांच की गई और न ही डॉ. सिन्हा के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। उल्टा, नियमों को ताक पर रखकर उन्हें कार्योत्तर (post-facto) अनुमति प्रदान कर दी गई, जो विभागीय नियमों और पारदर्शिता की मूल भावना के विपरीत है।

पुस्तकों का दान नहीं हुआ था, एक गहरी साजिश का हिस्सा था
सहायक प्राध्यापक डॉ. शर्मा ने बताया कि RTI के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट हुआ कि पुस्तकों का महाविद्यालय को विधिवत दान नहीं किया गया था। डॉ. दीपक सिन्हा ने अपने रिश्तेदार के माध्यम से पुस्तकें मंगवाईं और इन्हें स्टाफ रूम की एक लोहे की अलमारी में रखा। पुस्तकों का इश्यू और रिटर्न करना भी एक कागजी प्रक्रिया से अधिक नहीं था। चपरासी के पास अलमारी की चाबी होने से यह सवाल उठता है कि इन पुस्तकों का वास्तविक स्वामित्व किसका था।
दान की गई पुस्तकों का दावा भी झूठा प्रतीत
सहायक प्राध्यापक डॉ. शर्मा ने बताया कि मनीष मुंधड़ा द्वारा दान की गई पुस्तकों का दावा भी झूठा प्रतीत होता है। अगर यह पुस्तकें सच में उच्च गुणवत्ता की थीं, तो ‘नवबोध’ और ‘प्रबोध’ जैसी सामान्य पुस्तकों को रजिस्टर में क्यों दर्ज किया गया? इन पुस्तकों का नाम भी डॉ. दीपक सिन्हा और विभागाध्यक्ष के निर्देश पर ही दर्ज किया गया था। मनीष मुंधड़ा ने इन पुस्तकों को दान करने का दावा किया, लेकिन इसके लिए कोई दस्तावेजी प्रमाण या पावती पत्र नहीं प्रस्तुत किया गया।

जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल
सहायक प्राध्यापक डॉ. शर्मा ने बताया कि जांच समिति के गठन में कई अनियमितताएँ हैं। समिति ने न तो समुचित दस्तावेज़ों की जांच की और न ही विभागाध्यक्ष द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को गंभीरता से लिया। समिति ने बिना सही तथ्यों के पक्षपाती रिपोर्ट तैयार की और इसे मीडिया में प्रकाशित करवाया। समिति के सदस्य डॉ. दीपक सिन्हा ने खुद इस मामले में एक पक्षकार होते हुए अपनी निष्पक्षता खो दी, जिससे पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
एक निर्दोष शिक्षक को फंसाने की साजिश
इस पूरे मामले में एक निर्दोष सहायक प्राध्यापक को झूठे आरोपों में फंसाने की कोशिश की गई। जब यह मामला सामने आया, तो छात्रों के हित में आवाज उठाने वाले सहायक प्राध्यापक को षड्यंत्रपूर्वक फंसा दिया गया। जब उन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से शिकायत की, तो जाँच समिति को बदलने का आदेश दिया गया।

निष्कर्ष और भविष्य की दिशा
सहायक प्राध्यापक डॉ. शर्मा ने बताया कि यह मामला सिर्फ पुस्तकों के दान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक भ्रष्टाचार, जाँच प्रक्रिया की अनियमितताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों के दबाव की ओर भी इशारा करता है। अब देखना यह है कि क्या इस मामले में निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई की जाती है, या फिर प्रभावशाली व्यक्तियों के दबाव में इसे दबा दिया जाएगा। समिति के सदस्यों डॉ. एस. के. पटले, डॉ. एस. जी. घोष, विनोद जेना और अर्चना असतकर पर षड्यंत्र रचने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आयुक्त और मुख्यमंत्री से इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
