ढाई साल बाद फिर गूंजे बाघ के कदम उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व में दिखे पदचिह्न, ग्रामीणों में सतर्कता बढ़ी

दिनेश यदु @ Raipur : छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व में बाघ के पदचिह्न मिलने से पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। ढाई साल बाद बाघ के संकेत मिलने से वन्यजीवों के संरक्षण में एक नई उम्मीद जागी है। यह घटना वन विभाग और स्थानीय समुदाय दोनों के लिए चेतावनी के रूप में सामने आई है, क्योंकि बाघों की वापसी से जंगल में रहने वाले लोगों के लिए सुरक्षा की जरूरत और बढ़ गई है।
बाघ के पदचिह्न और शिकार के संकेत
24 अप्रैल 2025 को कुल्हाड़ीघाट परिक्षेत्र में बाघ के पदचिह्न मिले। यह संकेत सबसे पहले ग्रामीण वेबलाल सोरी ने दिए, जिन्होंने जंगल में बाघ के निशान और मरी हुई भैंसों के शव देखे थे। इस सूचना के आधार पर वन विभाग की टीम ने इलाके का निरीक्षण किया, जहां उन्हें बाघ के कई पंजों के निशान और दो शिकार किए गए भैंसों के शव मिले। बाघ की वापसी के इस स्पष्ट संकेत ने वन विभाग को बाघ की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

बाघ के पदचिह्नों का मुआयना
उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व के उप निदेशक वरुण जैन ने बताया, “हमने बाघ के पदचिह्नों का मुआयना किया और उन्हें प्लास्टर ऑफ पेरिस में ढालकर रिकॉर्ड किया। साथ ही, बाघ के मल के नमूने एकत्रित किए जा रहे हैं, ताकि डीएनए टेस्ट से यह पुष्टि की जा सके कि बाघ वही पुराना है या नया। यह सब बाघों के पुनः आगमन की पुष्टि करने में मदद करेगा।”

बाघों की वापसी का महत्व
उदंती सीतानदी क्षेत्र में बाघ की वापसी एक अच्छी खबर है, क्योंकि पिछले कई सालों में बाघों की उपस्थिति के कोई स्पष्ट संकेत नहीं थे। आखिरी बार अक्टूबर 2022 में कैमरा ट्रैप्स में बाघ की तस्वीर कैद हुई थी, और दिसंबर 2022 में बाघ का मल सैंपल भी एकत्र किया गया था। अब बाघ के पदचिह्नों से यह स्पष्ट हो गया है कि यह क्षेत्र बाघों के लिए उपयुक्त है और उनकी वापसी हो रही है।

ग्रामीणों की भूमिका और जागरूकता की आवश्यकता
उप निदेशक वरुण जैन ने बताया कि तेंदूपत्ता संग्रहण का सीजन चल रहा है, जिससे जंगल में लोगों की आवाजाही बढ़ सकती है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए, आसपास के गांवों में मुनादी करवाई जा रही है, ताकि लोग जंगल में बिना आवश्यक काम के न जाएं। पेट्रोलिंग बढ़ाई गई है, और कैमरा ट्रैप्स भी लगाए गए हैं, ताकि बाघों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके और उनकी पहचान की जा सके।
उप निदेशक वरुण जैन ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे बाघ के बारे में अधिक से अधिक जागरूकता फैलाएं। उन्होंने कहा, “ग्रामीणों को यह समझना होगा कि बाघ जंगल का अभिन्न हिस्सा हैं और उनके संरक्षण में हम सभी की भूमिका है। जब भी बाघ के बारे में कोई सूचना मिले, तो उसे तुरंत वन विभाग तक पहुंचाना जरूरी है। साथ ही, हमें अपने जंगलों और वन्यजीवों का संरक्षण करना होगा ताकि बाघ और अन्य जानवर अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रह सकें।”

बाघों की उपस्थिति और पारिस्थितिकी तंत्र
बाघ न केवल वन्यजीवों के संरक्षण का प्रतीक होते हैं, बल्कि उनका अस्तित्व पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन का भी संकेत है। बाघों की सुरक्षा पूरे वन्यजीव समुदाय की सेहत के लिए आवश्यक है। जब बाघों की संख्या घटती है, तो यह संकेत है कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन हो सकता है। इसलिए, बाघों के संरक्षण के लिए जागरूकता और समझ बढ़ाना जरूरी है।
