- इंद्रावती टाइगर रिजर्व के एक घायल बाघ की पीड़ा और इंसानी ‘संरक्षण’ पर सवाल
दिनेश यदु @ रायपुर ।मैं हूं बाघ।जंगल का राजा कहलाता हूं, मगर आज खुद के लिए एक कोना भी नहीं बचा जहां मैं बिना डर के सांस ले सकूं। मेरा नाम किसी रिपोर्ट में नहीं लिखा जाता, पर मेरी कहानी हर उस पेड़, हर उस चट्टान में छुपी है जहां मैं कभी बेफिक्र घूमता था।पर अब हालात बदल गए हैं।कुछ दिन पहले की बात है।

मैं इंद्रावती टाइगर रिजर्व के उसी जंगल में था जो कभी मेरा घर था।मेरे पैर में गहरी चोट लगी थी।चलना मुश्किल था।खून रिस रहा था।कहते हैं – मैं पत्थरों में फंस गया था, या फिर गांववालों के लगाए तार वाले फंदे में।कोई मुझसे नहीं पूछता – क्यों फंस गया था मैं?किसने बिछाया वो फंदा?क्यों जंगल में ऐसे जाल लगने लगे हैं जिनमें हम जानवर फंसते हैं, मरते हैं?मेरे आसपास इंसान हैं – हथियार लेकर घूमते शिकारी, या फिर बड़े दफ्तरों में बैठने वाले वन अधिकारी।कई बार महसूस होता है – ये दोनों ही अब एक जैसे लगते हैं।

पखवाड़े भर पहले कांदुलनार गांव में एक इंसान मारा गया।नाम था सर्वे कुन्ना।उसके साथ 10-12 लोग और थे – कहते हैं वो मेरी तरह ही एक घायल बाघ की रेकी कर रहे थे।शक है कि वे शिकारी थे।मेरे जैसे ही किसी बाघ ने आत्मरक्षा में हमला किया… और सर्वे कुन्ना मारा गया।अब मुझे इलाज के लिए रायपुर लाया गया।कहते हैं मेरी हालत स्थिर है।यहां मुझे इंजेक्शन दिए जाते हैं, जख्म पर मरहम लगाया जाता है…पर मेरे अंदर जो डर और गुस्सा है, उसका इलाज किसी के पास नहीं।

मैंने वन मंत्री केदार कश्यप की बात सुनी।उन्होंने कहा – “वन्यजीवों का संरक्षण हमारी प्राथमिकता है।”उन्होंने यह भी कहा – “बाघ को रेस्क्यू किया गया है और दोषियों पर कार्रवाई होगी।”क्या सच में संरक्षण हो रहा है?तो फिर मेरे जैसे कितने बाघ घायल हो रहे हैं, और कितने भालू मर रहे हैं जंगलों में – बिना किसी को पता चले?छह महीने पहले एक भालू की मौत हुई थी।किसी को भनक तक नहीं लगी, जब तक सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल नहीं हुआ।

वन विभाग के अधिकारी कहते हैं – “हम मुस्तैदी से काम कर रहे हैं।”सीसीएफ आरसी दुग्गा ने कहा – “शायद बाघ पत्थरों में फंसा था या ग्रामीणों के जाल में फंसा।”शायद?क्या एक घायल बाघ की पीड़ा का जवाब सिर्फ ‘शायद’ से दिया जाएगा?क्या सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए ही मेरी तकलीफ दिखेगी?कभी जंगल मेरी शान था।अब वही जंगल मेरे लिए जाल बन चुका है।

हर कदम पर खतरा है – इंसान का, शिकारी का, सिस्टम की लापरवाही का।क्या मैं वाकई ज़िंदा हूं, या बस मरने का इंतज़ार कर रहा हूं?मैं चीखना चाहता हूं –इस व्यवस्था से, इस ‘संरक्षण’ के ढोंग से, उस नीतियों से जो कागज़ पर बनी हैं पर जंगल में कहीं दिखती नहीं।मैं बाघ हूं…मेरे पंजे अब घायल हैं, मेरी दहाड़ कमजोर है,पर मेरी आंखों में अब भी उम्मीद है –कि एक दिन ये जंगल फिर मेरा घर बनेगा,ना कि किसी शिकारी का अड्डा।– घायल बाघ की जुबानी, इंद्रावती टाइगर रिजर्व से जंगल सफारी तक की व्यथा कथा
