- बूढ़े शिकारी की अंतिम लड़ाई, जिसने पर्यावरण प्रेमियों को भावुक कर दिया
- अब ‘नरसिंह’ हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी विरासत, उसकी कहानी और उसका साहस आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
दिनेश यदु @ Raipur : नवा रायपुर। नंदनवन रेस्क्यू सेंटर का एक प्रमुख वन्यजीव सदस्य, 16 वर्ष से अधिक आयु वाला नर तेंदुआ ‘नरसिंह’, अब हमारे बीच नहीं रहा। शनिवार, 10 मई 2025 को उसने लंबी बीमारी से जूझते हुए अंतिम सांस ली। नंदनवन के लिए यह केवल एक तेंदुए की मौत नहीं, बल्कि एक पूरे युग का अंत था—एक ऐसा वन्य योद्धा जिसने ना केवल वर्षों तक अपनी उपस्थिति से जंगल की शोभा बढ़ाई, बल्कि इंसानों को भी वन्यजीवन के महत्व की गहराई से समझ दिलाई।

बीमारी के साथ अंतिम लड़ाई
‘नरसिंह’ के चेहरे पर मार्च 2025 की शुरुआत में एक ट्यूमर का पता चला। उम्र बढ़ने के साथ उसकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो चुकी थी, जिससे वह इस बीमारी से लड़ने में असमर्थ होता गया। ट्यूमर के कारण उसका खाना-पीना और दवाएँ लेना धीरे-धीरे बंद होता गया। नंदनवन के पशु चिकित्सकों ने नियमित दवाइयों और देखभाल से राहत देने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन ट्यूमर का फैलाव रोकना मुश्किल हो गया।

उम्र से ऊपर उठकर जीया जीवन
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार तेंदुओं की औसत उम्र जंगलों में लगभग 12 से 15 वर्ष मानी जाती है, लेकिन ‘नरसिंह’ ने 16 साल से ज्यादा का जीवन जीकर इस औसत को पीछे छोड़ दिया। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, जो उसकी जिजीविषा और नंदनवन की देखभाल का प्रमाण है।

अंतिम विदाई और सम्मान
पोस्टमार्टम के बाद नरसिंह का विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया गया। सेंटर के अधिकारियों और कर्मचारियों ने भावुक माहौल में इस बुजुर्ग तेंदुए को अंतिम विदाई दी। वन विभाग के अनुसार, उसकी स्मृति में सेंटर में एक स्मृति चिह्न भी स्थापित किया जाएगा।

File Photo
नंदनवन की भूमिका और नरसिंह की विरासत
साल 2010 में स्थापित नंदनवन रेस्क्यू सेंटर अब तक सैकड़ों जानवरों का जीवन बचा चुका है। लेकिन ‘नरसिंह’ जैसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले और लोगों से जुड़ने वाले वन्यजीव विरले ही होते हैं। वह सेंटर की शान, पर्यावरण संतुलन का प्रतीक और वन्यजीवों के लिए एक प्रेरणास्रोत बनकर हमेशा याद रखा जाएगा।
